दोआबा- अंक : 19



● समय से संगत करती देश की महत्वपूर्ण पत्रिका
  'दोआबा' का ताज़ा अंक
● संपादक : प्रो. जाबिर हुसेन, 247 एम आई जी, लोहियानगर, पटना-800020 / 09431602575
● अंक : 19, वर्ष : 9, अक्टूबर 2015, मूल्य : 50 रुपये, पृष्ठ : 176, ISSN 2349-3887
● आवरण : वाज़दा ख़ान

● इस अंक में-
अपनी बात : सपने में लिखी इबारतें / जाबिर हुसेन
 
कथा : उदयन वाजपेयी, नासिरा शर्मा, अवधेश प्रीत, प्रियदर्शन, हरि राम मीणा, रामसरूप अणखी
 
कविता : लीलाधर मंडलोई, विजय शंकर, किरण अग्रवाल, शहंशाह आलम, सुषमा सिन्हा
 
दरीचा : चक्रवर्ती अशोक प्रियदर्शी
 
दृष्टि : जाबिर हुसेन, हेतु भारद्वाज, प्रभात सरसिज, रंजना श्रीवास्तव, अवध बिहारी पाठक
 
संवाद : हरि राम मीणा, सुषमा सिन्हा

'दोआबा' का अठारहवां अंक



'दोआबा' का अठारहवां अंक

● संपादक : जाबिर हुसेन
247 एम आई जी, लोहियानगर
पटना-800020
● मूल्य : 100 रुपये, पृष्ठ : 218

।। इस अंक में ।।

अपनी बात : जाबिर हुसेन

कथा : नीला प्रसाद, रामधारी सिंह दिवाकर, रामसरूप अवाखी

उपन्यास अंश : हरिराम मीणा

कविता : नाज़िक-अल-मलायका ( अनुवाद : नासिरा शर्मा ), राजेन्द्र उपाध्याय, रंजना श्रीवास्तव, प्रभात सरसिज, केशव शरण, राज्यवर्द्धन, राजकिशोर राजन, कुमार विजय गुप्त, मनोज मोहन

दरीचा : चक्रवर्ती अशोक प्रियदर्शी

आलेख : राजी सेठ, मधुरेश, तरसेम गुजराल

समीक्षा : अजित कुमार, किरण अग्रवाल, श्यामसुन्दर घोष, शंभु गुप्त, मनोज मोहन, शहंशाह आलम, अरुण अभिषेक ।

दोआबा, अंक- 17


’दोआबा’ : प्रगतिशील कवि अखतर पयामी के आत्मसंघर्ष को रेखांकित करता विशेषांक 

अखतर पयामी की कविता मेहनतकश आदमी के यथार्थ का आईना है। आईना इसलिए कि जब आदमी का आत्मसंघर्ष समाज में पूरी तरह रेखांकित नहीं हो पाता है तो कवि अपनी कविता को आदमी के आत्मसंघर्ष का आईना बना देता है। यही सबकुछ अपने समय के प्रगतिशील कवि अखतर पयामी ने अपने कविजीवन में किया है। वरिष्ठ साहित्यकार और ‘दोआबा’ के संपादक प्रो. जाबिर हुसेन ने ‘दोआबा’ (दोआबा प्रकाशन, 247 एम आई जी, लोहियानगर, पटना – 800020/ मूल्य : 50 रुपये / पृष्ठ : 234) का सतरहवां अंक अखतर पयामी की कविता पर केंद्रित किया है। अखतर पयामी लगभग सारी कविता में अपनी काव्यानुभूति आम आदमी के जीवनसंघर्ष से आरंभ करते हुए अपनी अनूठी काव्य भाषा और काव्यकशैली पर लाकर समाप्त करते हैं। अखतर पयामी की काव्य-संवेदना का ताप इतना गहरा और भारी है कि इनकी कविता को पढ़कर हमारे भीतर एक अलग तरह की ऊर्जा का संचार होता हुआ महसूस होता है। अखतर पयामी उर्दू के कालजयी कवि फैज अहमद फैज और हिन्दी के कालजयी कवि नागार्जुन की मार्क्सवादी परंपरा के कवि हैं। यही कारण है कि ‘दोआबा’ का यह अंक प्रगतिशील आंदोलन के परिप्रेक्ष्य में अखतर पयामी के साहित्यिक योगदान को न केवल विस्तारित करता है बल्कि निर्णायक रूप से हिन्दी पाठकों के बीच अखतर पयामी के विचारों को स्थापित भी करता है। इस अंक में कवि की दुर्लभ तस्वीरें भी छापी गई हैं। इस अंक में अखतर पयामी की नाट्यकविता ‘तारीख’ भी छापी गई है। इस कविता को ‘मौनुमेंटल’ रचना का दर्जा हासिल है। अखतर पयामी का निधन 8 अप्रैल, 2013 को हो गया परंतु ‘दोआबा’ के संपादक प्रो. जाबिर हुसेन इस अंक के बहाने प्रगतिशील आंदोलन का इतिहास लिखने वाले आलोचकों से एक सवाल करते दिखाई देते हैं कि ‘प्रगतिशील आंदोलन का इतिहास लिखने वाले आलोचकों और पत्रिकाओं के विशेषांक निकालने वाले संपादक अक्सर इस तहरीक को कुछ खास संज्ञाओं तक सीमित कर देते हैं। वो न तो गहराई से अध्ययन करते हैं और न पत्रिकाओं के पुराने अंक खंगालते हैं। यही वजह है कि उनकी किताबें अधूरेपन और तिश्नगी का एहसास कराती हैं। क्या इतिहासकारों को अपनी भूल सुधारने की जरूरत नहीं ।’

‘दोआबा’ के इस अंक में प्रो. जाबिर हुसेन का संपादकीय ‘हम तुम्हें कहां तलाश करें’ जहां पठनीय है, वहीं मनमोहन सरल और कर्मेन्दुं शिशिर का संस्मरण, शंभुगुप्त का अज्ञेय पर तो मधुरेश की गोपाल राय पर खास सामग्री के अलावे हरेप्रकाश उपाध्याय की कविताएं तथा मुशर्रफ आलम जौकी, रामाशंकर कुशवाहा, संजीव ठाकुर की समीक्षाएं भी छापी गई हैं।
   
                                               -कवि शहंशाह आलम के फेसबुक वाल से  

दोआबा के इस अंक में-

अखतर पयामी की 48 नज़्में..

दरीचा में..
मनमोहन सरल : चकत्ते-भर धूप की प्यास
कर्मेन्दु शिशिर : मुंगेर की स्मृतियां

कविता

हरे प्रकाश उपाध्याय

आलेख
शंभु गुप्त : अप्रत्यक्ष के मार्फ़त प्रत्यक्ष
मधुरेश : पचास साल लम्बी सड़क

समीक्षा/ संवाद
मुशर्रफ़ आलम ज़ौक़ी
एक संग्रह वादिये-हिकायत से
रामाशंकर कुशवाहा/ संजीव ठाकुर
अवध बिहारी पाठक
चुनौतियां झेलती एक पत्रिका
मुकेश प्रत्युष/मनमोहन सरल/ कासिम खुर्शीद/ श्रवणकुमार गोस्वामी

दोआबा, अंक - 16


..अपनी मौत से
हम सब को राजेन्द्र यादव ने
एक गहरे सन्नाटे  में डाल दिया

इस सन्नाटे और कसक
से उबरने में वक्त लगेगा ही
अर्से तक यह एहसास भी
बना रहेगा कि
सिर्फ़ राजेन्द्र यादव में ही
राजेन्द्र यादव बनने की ताकत थी

’दोआबा’ का यह अंक
उनकी इसी ताकत को समर्पित है..

अंक में-
अपनी बात
आत्मगत के अंतर्गत महताब अली - गाड़ीवान का बेटा
काव्य-नाटिका में अनुज लुगुन - रक्त-बीज

दरीचा
अनुपम मिश्र : दुनिया का खेला
निरंजन देव शर्मा : सफ़रनामा
मंगलमूर्त्ति : अब न वे दिन बहुरेंगे न वे लोग

कविता
राजी सेठ
किरण अग्रवाल
इला कुमार
भरत भूषण आर्य

आलेख / समीक्षा / संवाद
मधुरेश : समीक्षा की रचना प्रक्रिया
सुशील सिद्धार्थ : संवादधर्मिता साक्षात्कार का सौंदर्य है
ब्रज मोहन सिंह : कठिन दौर में कविता की चुनौतियां
शहंशाह आलम : अनवरत विरोध की कविताएं..

 

फांसी देने का मुझे, अजब निकाला ढंग।
कागज की तलवार दे, भेजा करने जंग॥

कार नहीं, नौकर नहीं, पास न एक मकान।
लगता है उसके अभी, पास बचा ईमान ॥
 
अंक में..

दोआबा, अंक- 15



इस अंक में :

शंभु गुप्त : शब्दों के पीलेपन का अतिक्रमण
रामधारी सिंह दिवाकर : कथा-डायरी का अगला पड़ाव
प्रेम कुमार : मर्मस्पर्शी, जीवंत सुरुचिसंपन्न
अवध बिहारी पाठक : ज़ख़्मों का हलफ़िया बयान
श्यासुंदर घोष : जाबिर हुसेन का कथा-शिल्प
पल्लव : जिंदा होने का सबूत देती कथाएं
मनोज मोहन : कल्पना और यथार्थ का मिटता फ़र्क
कल्पतरु एक्सप्रेस : कथा के शिल्प में भूमिगत डायरी
अमरनाथ : बेचैन करने वाली डायरी

दरीचा

चक्रवर्ती अशोक प्रियदर्शी : युग बदला : तीन

कहानी

मनमोहन सरल : जमी हुई झील
मीरा कांत : लंबी औरत
श्यामसुंदर घोष : सर्द रात और सख़्त जात
दिनेशचंद्र झा ’प्रवासी’ : आग की वैतरणी
सत्यम श्रीवास्तव : जस्टिस
विनोद कुमार : अश्लील पन्ने डायरी के

कविता

कर्मानंद आर्य की बारह कविताएं,
विस्वावा शिंबोर्स्का की पांच कविताएं
अशोक सिंह की चार कविताएं

बहस

विनोद रिंगानिया / जीतेन्द्र वर्मा / उर्मिला शिरीष / मनोज मोहन


­  टाइम्स आफ़ इंडिया में कांचा इलैया ने स्वाती माथुर से अपनी बातचीत में कहा - ’दलित समाज में बौद्धिक चेतना का विकास बहुत बाद की घटना है। इसके लिए जिस परिष्कृत शिक्षण की जरूरत है, उसका हमारी राजनीतिक धारा में नितांत अभाव है। उदाहरण के लिए, कर्पूरी ठाकुर जैसा एक लगभग निरक्षर नाई (ऎन आलमोस्ट इल्लिट्रेट बार्बर) बिहार का मुख्यमंत्री बन गया था.।
’दोआबा’ के ताज़ा अंक में संपादक जाबिर हुसेन का, कांचा इलैया की इस टिप्पणी पर वैचारिक प्रतिवाद...