साझे सपनों को साकार करता 'दोआबा' अंक - 10



    'दोआबा'  के इस अंक में  कविता एवं कहानियों में सिएथल, मीरा कुमार, स्नेहमयी चैधरी, सोनिया सिरसाट, राजेन्द्र नागदेव, राजकुमार कुम्भज, रामकुमार आत्रेय, सुशील कुमार, अशोक गुप्त, भारत भूषण आर्य और ज्ञानप्रकाश विवेक सम्मलित हैं। मीरा कांत का एकल नाटक- गली दुल्हनवाली, आत्मगत में मधुरेश और मनमोहन सरल का आलेख - भारत की आत्मा के चितेरे थे हुसेन के साथ संवेदना व वैचारिकता से पूर्ण संपादक जाबिर हुसेन के संपादकीय- ... मैं तुम्हारे शहर आऊँगा, सोहा, फिर आऊँगा... गहन सूक्ष्मता संजोए यथार्थ व संवेदनाओं का खूबसूरत कोलाज है।
    इस अंक में प्रकाशित मीरा कुमार  की कविता ‘साझा सपने’ की एक बानगी-
    है तुम्हारी पलकों पर इन्द्रधनुष
    उसके रंग मेरी आंखों में तैर रहे
    तुममें और मुझमें
    ये सपनों की कैसी साझेदारी है
    ...........
    ........      - अध्यक्ष, लोक सभा, नई दिल्ली।

दोआबा / संपादकः जाबिर हुसेन
सी-703, स्वर्ण जयंती सदन, डा बी डी मार्ग, नई दिल्ली 110 001.
मोबाइल- 09868181042.

... खेल शायद ख़त्म हो चुका है! दोआबा- 9 से -

अपनी बात
उसने फ़ातेहाना अंदाज़ में मेरे हाथों की तरफ़ देखा, जो हथकडि़यों से जकड़े हुए थे। फिर उसने मेरे पैरों पर नज़र डाली। वो बेडि़यों में थे। एक बार उसने मेरे होंठ टटोले, शायद सिर्फ यह देखने को कि इन में कोई हरकत या जुंबिश बची है या नहीं। फिर उसने अच्छी तरह मेरी आंखों में झांका। मुझे लगा, शायद परखने के लिए कि उनमें अब भी कोई सपना तो नहीं पल रहा।
एक घूमती हुई नज़र उसने मेरी गर्दन, और शायद मेरी रीढ़ की हड्डी पर भी डाली। वो अपनी तसल्ली कर लेना चाहता था कि मेरी गर्दन कितने कोण तक उठी या झुकी हुई है। या फिर मेरी रीढ़ की हड्डी क्या अब भी पहले की तरह तनी हुई है।
उसने मेरे कानों को बख़्श दिया। यह जानने की ज़हमत नहीं उठाई कि उनके पर्दे सही-सलामत हैं या नहीं।
मुकम्मल जांच-परख से शायद वो संतुष्ट हो गया था। तभी तो उसने अपने कारिंदों से कहा- ‘पहले हथकडि़यां, फिर बेडि़यां खोल दी जाएं।’
उसकी आंखों के इशारे पर चलने वाले कारिंदों ने हथकडि़यों में चाभी डाली, और मेरे दोनों हाथों को एक-दूसरे से अलग, आज़ाद कर दिया। वर्षों बाद, मैंने अपने हाथ उफर-नीचे हिलाए, अपनी हथेलियां जोड़ीं, और अपनी उंगलियों को एक-साथ फंसा कर देखना चाहा कि इनमें क़लम पकड़ने की ताक़त बाक़ी है या नहीं।
फिर उसके कारिंदों ने लोहे की गर्म सलाख़ों से मेरी बेडि़यां काटीं। मैंने देखा, बेडि़यां काटते वक्त, सलाख़ों से चिंगारियां निकल रही थीं।
हर बार, जब सलाख़ों से तेज़ चिंगारियां निकलतीं, वो चैंक कर एक क़दम पीछे हट जाता।
मुझे याद है, एक बार तो उसने अपने कारिंदों को शक की निगाह से भी देखा-
‘इतनी चिंगारियां कहां से निकल रही हैं। उन्हें फैलने से रोको।’
ग़रीब कारिंदा, हुक्म का गुलाम, उस लम्हा सहम गया था। मैंने खुद महसूस किया, उसके हाथ कांपे थे। पर वो ज़रूर ही संभल गया था।
मेरी बेडि़यां काटने में ज़्यादा देर नहीं लगी। इस बीच, वो खुद वहां मौजूद रहा, अपने सलाहकारों के साथ।
हथकडि़यां खुल गईं, बेडि़यां कट गईं, तो मैं दीवार का सहारा लेकर खड़ा हुआ। मेरे पैर ज़रा देर के लिए लड़खड़ाए। मेरी रगों में, वर्षों से जो खून के क़तरे, आहिस्ता-आहिस्ता, सरक रहे थे, एकबारगी दबाव में आकर उबले। मुझे अपनी रगें फटती महसूस हुईं। मैं थोड़े समय के लिए घबराया। अंधेरे का एक हल्का बादल थोड़ी देर के लिए मेरी आंखों के सामने उभरा। लेकिन मैं शायद संभाल सका था अपने को।
तभी मुझे उसकी आवाज़ सुनाई दी-
‘तुम्हारे हाथ-पैर आज़ाद हैं अब। तुम चल सकते हो, अपने हाथों से अपने काम निपटा सकते हो। लेकिन तुम इस चहारदीवारी से बाहर नहीं जा सकते। मेरे कारिंदे तुम पर नज़र रखेंगे। दूसरे कै़दियों से तुम्हारा कोई संपर्क नहीं रहेगा।’
फिर उसने अपने कारिंदों को इशारा किया।
उनमें से एक ने मेरी आंखों पर काली पट्टी चढ़ा दी। अब मैं पूरी तरह अंध्ेरे की गिरफ़्त में था। कोई मेरा हाथ थामे मुझे अपने साथ बढ़ाए चल रहा था।
एक लंबी दूरी तय करने के बाद मेरी आंखों पर लगी काली पट्टी खोल दी गई। मैंने देखा, यह नई जगह पहले से ज़्यादा खुली, फैली और हवादार थी। यहां रौशनी आने के कई रास्ते थे। उसे रोकने वाली दीवारें नहीं थीं यहां। बिल्कुल नहीं थीं।
मेरे आने से पहले ही वो यहां पहुंच चुका था। मेरी आंखों की काली पट्टी खोली गई, तो सामने मुझे उसका ही चेहरा सबसे पहले दिखाई दिया।
‘यह जगह तुम्हें पसंद आएगी। तुम यहां आराम से रह सकोगे, जब तक तुम हमारी हिदायतों पर चलते रहोगे। मेरी हिदायतें ज़्यादा सख़्त नहीं होंगी। तुम्हें बस अपने होंठ सिले रखने होंगे। तुम किसी से बातचीत नहीं करोगे। हम चाहते हैं, भूल जाओ कि तुम कभी अपने चाहने वालों के सामने, बेख़ौ़फ, अपनी भावनाएं व्यक्त करते थे। तुम्हारी भावनाएं मुझे आहत करती रही हैं। मेरी सत्ता को इन भावनाओं से ख़तरा है। इसलिए, तुम अपनी ज़बान बंद रखोगे, हमेशा के लिए, सदा।’
इतना कहकर वो अपने सलाहकारों के साथ इस नई जगह से चला गया।
उसके चले जाने पर, मैंने इस जगह का जायज़ा लिया। सचमुच, यह जगह अच्छी थी। पहले वाली जगह से इसकी कोई तुलना नहीं हो सकती। जगह-जगह, फूल-पत्तियां थीं, साफ़-शफ़्फ़ा़फ़ पानी के संगमरमरी ़फव्वारे थे। सड़कों के इर्द-गिर्द, हरी-हरी, गद्देदार घास की क़ालीनें थीं। ऊंचे-नीचे मीनारों से बिखरती रौशनी का तिलिस्म था। जगह-जगह, खूबसूरत चेहरों के झुरमुट थे। चेहरों पर बेबाक मुस्कुराहटों का जादू था।
नई जगह, सचमुच, नई थी। बिल्कुल नई। दिलों को अपनी मुट्ठी में बांध लेने वाली जगह!
एक नई दुनिया थी, मेरे लिए, यह जगह। खुशी-खुशी रह सकता हूं मैं इस जगह। जब तक मैं उसकी हिदायतों पर दिलोजान से अमल करता रहूं। मेरे लिए उसने बस एक छोटी-सी शर्त लगाई है, बस एक मुख़्तसर-सी शर्त। मुझे अपने होंठ सिले रखने हैं। अपनी ज़बान बंद रखनी है।
यह नई जगह, दरअसल, एक रंगमंच है। मैं इस रंगमंच का एक अहम किरदार हूं। शायद इस रंगमंच का सबसे पुराना किरदार। मुझ याद नहीं, (मेरे तजुर्बों ने शायद मेरी याददाश्त पर असर डाला हो) मैंने कितनी सदियां इस रंगमंच पर इसी तरह गुज़ारी हैं। हाथों में हथकडि़यां, पैरों में बेडि़यां, आंखों पर स्याह पट्टी, सिले हुए होंठ, बंद ज़बान!
रंगमंच का पर्दा, अभी-अभी, उठा है। खेल जहां  ख़त्म होता है, वहीं से शुरू हुआ है। मैंने अपनी आज़ाद मुट्ठियां भींचीं हैं, हवा में लहराई हैं। मेरे पैरों की झंकार से मंच की सतह पर एक कंपन-सा महसूस हुआ है। मैंने अपनी रीढ़ की हड्डी को किसी जिंदा दरख़्त के मज़बूत तने की तरह सीध किया है। और अपनी गर्दन आसमान की सम्त उठाकर अपने होंठों को हरकत दी है।
अब मेरी आंखों के सामने उसका चेहरा नहीं है।
उसके सलाहकारों, कारिंदों के चेहरे भी नहीं हैं अब मेरे सामने।
मंच पर तेज़ रौशनी फैल गई है।
सामने, हज़ारों-हज़ार की तादाद में, तमाम उम्र के लोग, बेताबी से, तालियां बजा रहे हैं।
खेल शायद ख़त्म हो चुका है!

जाबिर  हुसेन

’दोआबा’ समय से संगत- अंक- 9


इस अंक में:

आत्मगत
मधुरेश : पिता की दुनिया

कविता
नीलाभ, किरण अग्रवाल, अरविंद श्रीवास्तव, राधेलाल बिजधावने, हुस्न तबस्सुम ‘निहां’

उपन्यास अंश
नरेन्द्र नागदेव: एक स्विच था भोपाल में

कहानी
रोहिताश्व: देह का अनहद राग / विनोद रिंगानिया: इज़्ज़त / नरेश कुमार ‘उदास’: यहां तुम्हारा कोई नहीं

संवाद
प्रेम शशांक: अकारण नहीं है यह भ्रम / रणजीत पांचाले: राधेश्याम कथावाचक / संजीव ठाकुर: दोस्ती का पुल / नरेन्द्र पुण्डरीक: जनता का रंग सारे रंगों से ऊपर / श्यौराजसिंह बेचैन: दलित चेतना के दायरे / सुरेश पंडित: सब कुछ ठीक नहीं है / प्रभा दीक्षित: मेरी वोल्टसन क्राफ्ट / इला कुमार: मन के बिंब / दिलीप मंडल: लोकतंत्र, चुनाव और मीडिया

नज़रिया: मनमोहन सरल, मनोज मोहन, आबिद सुरती, विशाल और प्रगतिशील आकल्प।
दोआबा,
संपादक: जाबिर हुसेन
संपर्कः 09431602575., 09868181042.

जी, सारा, सारा जोन्स। मैं गोआ से आती हूं....




अपनी बात
कई छोटी-बड़ी मशीनों का सावधनीपूर्वक इस्तेमाल करके, चेहरे पर संतोष की रेखाएं खींचते, डा लालवानी ने कहा - आपकी आंखें बिल्कुल ठीक हैं, पावर लगभग पहले जैसा है। इतने वर्षों में, कोई ख़ास प़फर्क़ नहीं आया। तीन-चार महीने पर, दोबारा ज़रूर दिखा लेंगे।
डा लालवानी के कमरे से बाहर आते वक़्त मेरे दिमाग़ में एक ही वाक्य जैसे गूंज रहा हो। ठीक हैं मेरी आंखें तो पिफर इन आंखों के पर्दों पर परछाइयां-सी क्यों छाई रहती हैं, हर वक़्त। मैं इन परछाइयों के परे कुछ देख क्यों नहीं पाता! हर वक़्त, इन परछाइयों की ओट में रेल की पटरियां-सी क्यों बिछी नज़र आती हैं। और पिफर, इन पटरियों पर ख़ून के चकत्ते-से क्यों उभरते दिखाई देते हैं। मेरी आंखें ख़ून के इन चकत्तों से पूरी तरह ढंक क्यों जाती है! फिर इन चकत्तों से आनेवाली ताज़ा ख़ून की बू मेरी नाक पर क्यों बिछ जाती है।
डा लालवानी! आप कहते हैं, मेरी आंखें बिल्कुल ठीक हैं, इन्हें कुछ नहीं हुआ। इनके विज़न में कोई प़फर्क़ नहीं आया। ज़रूर ही, डा लालवानी, आपकी मशीनें आपको धेखा नहीं दे सकतीं। खुद आपकी बारीक आंखें इतनी तजुर्बेकार हैं कि मेरी आंखों में आई हल्की-सी तब्दीली भी आपसे छिप नहीं सकती। लेकिन ऐसा क्यों है कि आप इन तजुर्बेकार आंखों से मेरी आंखों पर उभरने वाली परछाइयां नहीं देख पाते। और इन पर बिछी रेल की पटरियां, जिन पर ताज़ा ख़ून के चकत्ते पैफल गए हैं, आपकी आंखों से ओझल रहती हैं। ऐसा क्यों है, डा लालवानी! मुझे अपने किसी सवाल का जवाब नहीं मिलता। डाक्टर मुझे ‘शुक्रिया’ कहकर मेज़ के दूसरे किनारे खड़े अपने किसी सहयोगी की तरपफ़ मुख़ातिब हो जाते हैं। मैं दरवाज़े की ओर बढ़ता हूं। रेल की पटरियां, ख़ून के चकत्ते मेरा पीछा करते हैं। पोर्टिको तक, दोनों मेरे साथ-साथ आते हैं। कार में बैठते ही, मैंने अपनी दोनों आंखें बंद कर ली हैं। रेल की पटरियां, और उन पर, दूर-दूर, पैफले ताज़ा ख़ून के चकत्ते मेरी बंद आंखों में और भी रौशन होकर उभर रहे हैं!
हवाई जहाज़ की पहली क़तार में, खिड़की की तरफ बैठते ही, मैंने अपने फोलियो बैग से वह पांडुलिपि निकाल ली है। तभी, सीट-बेल्ट बांध् लेने की अपील के साथ, पूरे जहाज़ में पैफली तेज़ रोशनी अचानक म(िम होकर अंध्ेरे में बदल जाती है। मैंने कैबिन की तरप़फ देखा। मेरे हाथ में पड़ी पांडुलिपि अंध्ेरे का शिकार हो गई है। आंखें जब अंध्ेरे की अभ्यस्त हुईं, तो मैंने उफपर हाथ बढ़ाकर रीडिंग लाइट जलानी चाही। सीट-बेल्ट कुछ ज़्यादा ही कस गई है। कैबिन-क्रू ने मेरी सहायता की और जहाज़ की छत से टंगे दोनों रौशनी के बुंदे पांडुलिपि पर केंद्रित हो गए।
आज मैंने फलों के जूस नहीं लिए। स्नैक्स की ट्रे आई। मेरे आगे छोटी मेज़ पर फैली पांडुलिपि के पन्ने देखकर ट्रे लौट गई। चाय-काफी, मेरे लिए आज सब अजनबी हो गए हैं। बाज़्ाू की सीट ख़ाली है, इसलिए मैं पांडुलिपि के पन्ने, बारी-बारी, उसपर सरका रहा हूं।
यह मेरा इस पांडुलिपि का दूसरा पाठ है। आंसुओं से भीगी, ताज़ा ख़ून में डूबी पांडुलिपि का दूसरा पाठ! यकायक पांडुलिपि के पन्नों से रेल के गड़गड़ाने की आवाज़ उभरने लगी। मुझे महसूस हुआ, जैसे यकायक मेरे सिर से रेल के कई-कई डब्बे, एक-साथ, गुज़र गए हों, तेज़ आवाज़ के साथ। मैंने घबराकर खिड़की के बाहर देखा। आसमान पर शाम का ध्ुंध्लका पूरी तरह छा गया है, और डूबने वाले सूरज की सुनहरी किरणें दम तोड़ रही हैं। आसमान साप़फ है, बिल्कुल साप़फ। दूर-दूर तक, बादल नहीं हंै, बादलों की परछाइयां तक नहीं हैं।
परछाइयों से याद आया। मेरी आंखों पर छाई रेल की पटरियों की परछाइयां, और उन पर ताज़ा ख़ून के चकत्ते! चकत्ते और परछाइयां, जिन्हें डा लालवानी की बारीक निगाहें नहीं देख पाई हैं। लेकिन, जो लगातार मेरी आंखों पर छाई हैं! हवाई जहाज़ काफी बुलंदी पर उड़ रहा है। मेरे हाथों में पांडुलिपि के पन्ने उन परिंदों की तरह फड़फड़ा रहे हैं, जिन्हें अभी-अभी किसी तजुर्बेकार शिकारी ने मौत की नींद सुला दिया है। परिंदों के जिस्म से ख़ून के क़तरे टपक रहे हैं। ताज़ा ख़ून के क़तरे!
मुमकिन है, ये परिंदे बेजान होकर आसमान की उंफचाइयों पर उड़ने वाले जहाज़ से नीचे गिर पड़े हों, और उनके जिस्म से टपकने वाले ताज़ा खून के क़तरे किसी बंजर ज़मीन पर उगी रेल की पटरियों पर पैफल गए हों।
ताज़ा खून के चकत्ते-जैसे!
बंजर ज़मीन पर उगी रेल की पटरियां और उन पर फैले ताज़ा खून के चकत्ते! मेरी आंखों पर छाई परछाइयों की फ़िज़ा शायद इन दोनों ने मिलकर तैयार की हो! लेकिन ये फिज़ा अभी मुकम्मल कहां हुई! अभी इसमें एक ज़िंदा जिस्म और एक ज़िंदा रूह की बेताबियों का रंग घुलना बाक़ी है। तभी तो ये फिज़ा शफक़ की रंगीनियों का अक्स बन पायेगी! अभी कहां! अभी एक जिंदा जिस्म की बोटियों से इस फ़िज़ा की दस्तारबंदी होना बाफी है!
मैं पांडुलिपि के आख़िरी पन्ने पर हूं। हवाई जहाज़ का मेरा यह सफर भी शायद अपनी आख़िरी छलांग ले रहा है। मेरी आंखों पर, आसमान के आंगन में उगे सितारों की तरह, किसी बंजर ज़मीन पर उगी रेल की पटरियां और ताज़ा खून के चकत्ते उभर आये हैं। पटरियां और चकत्ते!
हवाई जहाज़ ज़मीन को सजदा कर रहा है। कैबिन-क्रू ने सारी रौशनियां जला दी हैं। जहाज़ का अंधेरा मुंह छिपाने की कोशिश में है। लेकिन, मेरी आंखों पर छाई परछाइयां बरक़रार हैं। परछाइयां, जिनमें रेल की पटरियां हैं, ताज़ा खून के चकत्ते हैं, और ज़िंदा जिस्म की, कई-कई टुकड़ों में बंटी, खुशबुएं हैं।
जहाज़ की रफ्तार एकदम से थम गई है। कोई ख़ूबसूरत आवाज़ यात्रियों से विनम्र अनुरोध कर रही है - कृपया अगली क़तार के लोगों को पहले उतरने दें।
मैं सीढ़ियां उतरने को तैयार हूं कि कैबिन-क्रू ने आवाज़ दी - सर, आपके पेपर्स।
मैंने देखा, उसके हाथों में पांडुलिपि के बिखरे पन्ने थे। जो मैं बाज़्ाू की सीट पर छोड़ आया था।
शुक्रिया!
क्या मैं तुम्हारा नाम जान सकता हूं ?
जी, मैं सारा हूं।
सारा!
जी, सारा, सारा जोन्स। मैं गोआ से आती हूं।
मेरी आंखों में छाई परछाइयां अचानक एक बर्फीली धुंध में बदल गई हैं।
बर्फीली धुंध! रेल की बेजान पटरियां! ताज़ा खून के चकत्ते!

-जाबिर हुसेन

मैदान मेरा हौसला है, आंगन मेरी ख़्वाहिश - सारा शगुफ़्ता की रचनाशीलता को समर्पित ‘दोआबा’ का यह अंक

                                                                        
                                                                         मैं टूटे चांद को सुबह तक गंवा बैठी हूं
इस रात कोई काला फूल खिलेगा
मैं अनगिनत आंखों से टूट गिरी हूं
मेरा लहू कंकर कंकर हुआ
मेरे पहले क़दम की ख़ाहिश दूसरा क़दम नहीं
मेरे ख़ाक होने की ख़ाहिश मिटी नहीं

ऐ मेरे पालने वाले ख़ुदा
मेरा दुख नींद नहीं, तेरा जाग जाना है
कौन मेरी ख़ामोशी पे बैन करता है
कौन मेरे सुख के कंकर aचुनता है
ये रोज़, ये रोज़ कौन मर जाता है
-सारा


इस अंक के रचनाकार-

मंगलेश डबराल ,शाहिद  अनवर ,विष्णु नागर, किरण अग्रवाल, विजय शंकर, राजेन्द्र नागदेव, भारत भूषण आर्य, आर चेतनक्रांति, विपिन चैधरी, अवधेश अमन, फरीद खां, मधुरेश, मनमोहन  सरल,  राबिन शा  पुष्प, ज्ञानप्रकाश विवेक, मुकेश प्रत्युष,, अमिता कुमारी, राहुल राजेश, प्रेम शशांक, गिरीश मिश्र, सुरेश पंडित, शिवदयाल, उर्मिला शिरीष ,संजय कृष्ण और नरेन्द्र पुण्डरीक 

दोआबा
संपादकः जाबिर हुसेन
247 एम आई जी, लोहियानगर
पटना- 800020.
मोबाइल- 09431602575.