दोआबा अंक : 21



दोआबा
अंक : 21

यह अंक पानी के पहरेदार रहे अनुपम मिश्र की स्मृतियों को समर्पित है

■ 'पानी की पहरेदारी' विषयक इस अंक में महत्वपूर्ण :

संपादकीय : जाबिर हुसेन
 
विशेष : अनिल प्रकाश
 
अनुपम की याद : ध्रुव शुक्ल, राजकुमार कुम्भज, राजीव रंजन गिरि, सुरेंद्र बांसल
 
शब्दों में अनुपम : अनुपम मिश्र की रचनाएँ, अनुपम मिश्र से योगिता शुक्ला की बातचीत
 
कथा : कविता, नरेन्द्र नागदेव
 
कविता : प्रियदर्शन, प्रभात सरसिज, कर्मानंद आर्य
 
दरीचा : अजित कुमार, वीरेन डंगवाल, मधुरेश, तरसेम गुजराल, हरि राम मीणा, चक्रवर्ती अशोक प्रियदर्शी

अंक के लिए, रचना भेजने के लिए, अन्य जानकारी के लिए संपादकीय संपर्क :
 जाबिर हुसेन   
संपादक, 'दोआबा'
247 एम आई जी, लोहियानगर, पटना-800 020
मोबाइल : 09431602575
e-mail : doabapatna@gmail.com

दोआबा अंक - 20



'दोआबा' के बीसवें अंक में..



कथा : चन्द्रकिशोर जायसवाल, नरेन्द्र सैनी, नरेन्द्र निर्मल।

दरीचा : असग़र वजाहत, अशोक प्रियदर्शी, राजेन्द्र राजन।

दृष्टि : अशोक वाजपेयी, अवधेश अमन।



 कविता : अष्टभुजा शुक्ल, किरण अग्रवाल, अनिल विभाकर, सुशील कुमार, शहंशाह आलम, शिवदयाल, कुमार विक्रम, अनुराग अन्वेषी, बजरंग विश्नोई, मनोज मोहन, अरविन्द श्रीवास्तव, अशोक सिंह, प्रत्यूष चन्द्र मिश्र।

संवाद : अवध बिहारी पाठक, शहंशाह आलम, सैयद जावेद हसन।


* आपकी प्रगतिशील, अप्रकाशित साहित्यिक रचनाओं का स्वागत है- प्रो. जाबिर हुसेन, संपादक 'दोआबा', 247 एम आई जी, लोहियानगर, पटना- 800 020 पर अथवा doabapatna@gmail.com से भेज सकते हैं। मोबाइल- 9431602575.

दोआबा- अंक : 19



समय से संगत करती देश की महत्वपूर्ण पत्रिका
  'दोआबा' का ताज़ा अंक
संपादक : प्रो. जाबिर हुसेन, 247 एम आई जी, लोहियानगर, पटना-800020 / 09431602575
अंक : 19, वर्ष : 9, अक्टूबर 2015, मूल्य : 50 रुपये, पृष्ठ : 176, ISSN 2349-3887
आवरण : वाज़दा ख़ान

इस अंक में-
अपनी बात : सपने में लिखी इबारतें / जाबिर हुसेन
 
कथा : उदयन वाजपेयी, नासिरा शर्मा, अवधेश प्रीत, प्रियदर्शन, हरि राम मीणा, रामसरूप अणखी
 
कविता : लीलाधर मंडलोई, विजय शंकर, किरण अग्रवाल, शहंशाह आलम, सुषमा सिन्हा
 
दरीचा : चक्रवर्ती अशोक प्रियदर्शी
 
दृष्टि : जाबिर हुसेन, हेतु भारद्वाज, प्रभात सरसिज, रंजना श्रीवास्तव, अवध बिहारी पाठक
 
संवाद : हरि राम मीणा, सुषमा सिन्हा

'दोआबा' का अठारहवां अंक



'दोआबा' का अठारहवां अंक

संपादक : जाबिर हुसेन
247 एम आई जी, लोहियानगर
पटना-800020
मूल्य : 100 रुपये, पृष्ठ : 218

।। इस अंक में ।।

अपनी बात : जाबिर हुसेन

कथा : नीला प्रसाद, रामधारी सिंह दिवाकर, रामसरूप अवाखी

उपन्यास अंश : हरिराम मीणा

कविता : नाज़िक-अल-मलायका ( अनुवाद : नासिरा शर्मा ), राजेन्द्र उपाध्याय, रंजना श्रीवास्तव, प्रभात सरसिज, केशव शरण, राज्यवर्द्धन, राजकिशोर राजन, कुमार विजय गुप्त, मनोज मोहन

दरीचा : चक्रवर्ती अशोक प्रियदर्शी

आलेख : राजी सेठ, मधुरेश, तरसेम गुजराल

समीक्षा : अजित कुमार, किरण अग्रवाल, श्यामसुन्दर घोष, शंभु गुप्त, मनोज मोहन, शहंशाह आलम, अरुण अभिषेक ।

दोआबा, अंक- 17


’दोआबा’ : प्रगतिशील कवि अखतर पयामी के आत्मसंघर्ष को रेखांकित करता विशेषांक 

अखतर पयामी की कविता मेहनतकश आदमी के यथार्थ का आईना है। आईना इसलिए कि जब आदमी का आत्मसंघर्ष समाज में पूरी तरह रेखांकित नहीं हो पाता है तो कवि अपनी कविता को आदमी के आत्मसंघर्ष का आईना बना देता है। यही सबकुछ अपने समय के प्रगतिशील कवि अखतर पयामी ने अपने कविजीवन में किया है। वरिष्ठ साहित्यकार और ‘दोआबा’ के संपादक प्रो. जाबिर हुसेन ने ‘दोआबा’ (दोआबा प्रकाशन, 247 एम आई जी, लोहियानगर, पटना – 800020/ मूल्य : 50 रुपये / पृष्ठ : 234) का सतरहवां अंक अखतर पयामी की कविता पर केंद्रित किया है। अखतर पयामी लगभग सारी कविता में अपनी काव्यानुभूति आम आदमी के जीवनसंघर्ष से आरंभ करते हुए अपनी अनूठी काव्य भाषा और काव्यकशैली पर लाकर समाप्त करते हैं। अखतर पयामी की काव्य-संवेदना का ताप इतना गहरा और भारी है कि इनकी कविता को पढ़कर हमारे भीतर एक अलग तरह की ऊर्जा का संचार होता हुआ महसूस होता है। अखतर पयामी उर्दू के कालजयी कवि फैज अहमद फैज और हिन्दी के कालजयी कवि नागार्जुन की मार्क्सवादी परंपरा के कवि हैं। यही कारण है कि ‘दोआबा’ का यह अंक प्रगतिशील आंदोलन के परिप्रेक्ष्य में अखतर पयामी के साहित्यिक योगदान को न केवल विस्तारित करता है बल्कि निर्णायक रूप से हिन्दी पाठकों के बीच अखतर पयामी के विचारों को स्थापित भी करता है। इस अंक में कवि की दुर्लभ तस्वीरें भी छापी गई हैं। इस अंक में अखतर पयामी की नाट्यकविता ‘तारीख’ भी छापी गई है। इस कविता को ‘मौनुमेंटल’ रचना का दर्जा हासिल है। अखतर पयामी का निधन 8 अप्रैल, 2013 को हो गया परंतु ‘दोआबा’ के संपादक प्रो. जाबिर हुसेन इस अंक के बहाने प्रगतिशील आंदोलन का इतिहास लिखने वाले आलोचकों से एक सवाल करते दिखाई देते हैं कि ‘प्रगतिशील आंदोलन का इतिहास लिखने वाले आलोचकों और पत्रिकाओं के विशेषांक निकालने वाले संपादक अक्सर इस तहरीक को कुछ खास संज्ञाओं तक सीमित कर देते हैं। वो न तो गहराई से अध्ययन करते हैं और न पत्रिकाओं के पुराने अंक खंगालते हैं। यही वजह है कि उनकी किताबें अधूरेपन और तिश्नगी का एहसास कराती हैं। क्या इतिहासकारों को अपनी भूल सुधारने की जरूरत नहीं ।’

‘दोआबा’ के इस अंक में प्रो. जाबिर हुसेन का संपादकीय ‘हम तुम्हें कहां तलाश करें’ जहां पठनीय है, वहीं मनमोहन सरल और कर्मेन्दुं शिशिर का संस्मरण, शंभुगुप्त का अज्ञेय पर तो मधुरेश की गोपाल राय पर खास सामग्री के अलावे हरेप्रकाश उपाध्याय की कविताएं तथा मुशर्रफ आलम जौकी, रामाशंकर कुशवाहा, संजीव ठाकुर की समीक्षाएं भी छापी गई हैं।
   
                                               -कवि शहंशाह आलम के फेसबुक वाल से  

दोआबा के इस अंक में-

अखतर पयामी की 48 नज़्में..

दरीचा में..
मनमोहन सरल : चकत्ते-भर धूप की प्यास
कर्मेन्दु शिशिर : मुंगेर की स्मृतियां

कविता

हरे प्रकाश उपाध्याय

आलेख
शंभु गुप्त : अप्रत्यक्ष के मार्फ़त प्रत्यक्ष
मधुरेश : पचास साल लम्बी सड़क

समीक्षा/ संवाद
मुशर्रफ़ आलम ज़ौक़ी
एक संग्रह वादिये-हिकायत से
रामाशंकर कुशवाहा/ संजीव ठाकुर
अवध बिहारी पाठक
चुनौतियां झेलती एक पत्रिका
मुकेश प्रत्युष/मनमोहन सरल/ कासिम खुर्शीद/ श्रवणकुमार गोस्वामी